वैश्विक परमाणु नीति और सुरक्षा: 2025 के बाद दुनिया कैसे बदल रही है, जानें सब कुछ

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국제 원자력 정책과 안전규정 - A highly detailed, realistic image of an international team of diverse nuclear scientists and engine...

नमस्ते मेरे प्यारे दोस्तों और ऊर्जा के भविष्य में रुचि रखने वाले पाठकों! कैसे हैं आप सब? मुझे पता है, आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम सब कुछ ऐसा ढूंढ रहे हैं जो हमारे कल को बेहतर बनाए, और इसी खोज में परमाणु ऊर्जा यानी न्यूक्लियर एनर्जी का नाम अक्सर सामने आता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इस असीम शक्ति को सुरक्षित और सही तरीके से इस्तेमाल करने के लिए दुनिया भर में क्या नियम-कानून हैं?

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जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों के बीच, जब हर कोई क्लीन एनर्जी की बात कर रहा है, तो परमाणु ऊर्जा एक उम्मीद की किरण बनकर उभरी है, लेकिन इसके साथ ही इसकी सुरक्षा और वैश्विक नीतियों पर भी बहस तेज हो गई है। हाल ही में, अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) ने परमाणु सुरक्षा और सामग्री की तस्करी पर चिंता जताई है, जो हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि यह विषय कितना महत्वपूर्ण है। भारत भी 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु ऊर्जा उत्पादन का लक्ष्य लेकर चल रहा है, और इसमें निजी क्षेत्र की भागीदारी भी बढ़ रही है, लेकिन इतनी बड़ी योजनाओं के साथ, सुरक्षा और नियमों को समझना और भी जरूरी हो जाता है। छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर (SMRs) जैसी नई तकनीकों की चर्चा भी खूब हो रही है, जो परमाणु ऊर्जा के भविष्य को बदलने का माद्दा रखती हैं। यह सब जानकर मन में कई सवाल आते हैं – क्या हम सही दिशा में जा रहे हैं?

क्या हमारी नीतियाँ और सुरक्षा के इंतज़ाम काफी हैं? और सबसे महत्वपूर्ण, यह सब हमारे और हमारे ग्रह के लिए क्या मायने रखता है? दोस्तों, जब भी हम परमाणु ऊर्जा की बात करते हैं, तो मन में उम्मीद और आशंका दोनों एक साथ उठती हैं। एक तरफ यह हमारी ऊर्जा ज़रूरतों और जलवायु संकट का एक शक्तिशाली समाधान हो सकती है, वहीं दूसरी तरफ चेरनोबिल और फुकुशिमा जैसी दुर्घटनाओं की यादें आज भी हमें सचेत करती हैं। लेकिन क्या आपको पता है कि इस असीम शक्ति को नियंत्रित करने के लिए दुनिया भर में कौन से नियम और कानून बनाए गए हैं?

अंतर्राष्ट्रीय परमाणु नीतियाँ और सुरक्षा विनियम हमें कैसे सुरक्षित रखते हैं, और कौन से नए रुझान इसके भविष्य को आकार दे रहे हैं? आइए आज हम इन सभी सवालों के जवाब ढूंढते हैं, और अंतरराष्ट्रीय परमाणु नीति और सुरक्षा नियमों के इस जटिल लेकिन बेहद ज़रूरी सफर पर एक साथ चलते हैं। इस विषय पर हर एक बारीक जानकारी को विस्तार से समझेंगे।

दोस्तों, मुझे पता है कि जब भी हम ‘परमाणु ऊर्जा’ शब्द सुनते हैं, तो मन में एक अजीब सी हलचल मच जाती है। कुछ लोग इसे भविष्य की स्वच्छ ऊर्जा का सबसे बड़ा समाधान मानते हैं, तो कुछ लोग चेरनोबिल और फुकुशिमा जैसी दर्दनाक दुर्घटनाओं को याद कर सिहर उठते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस असीमित शक्ति को सुरक्षित और जिम्मेदार तरीके से इस्तेमाल करने के लिए दुनिया भर में कितने कड़े नियम-कानून बनाए गए हैं?

अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) जैसी संस्थाएं और विभिन्न संधियां हमारी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए दिन-रात काम करती हैं। भारत जैसे देश भी अपने महत्वाकांक्षी परमाणु ऊर्जा लक्ष्यों को प्राप्त करने के साथ-साथ सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हैं। छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर (SMRs) जैसी नई तकनीकों के उदय ने इस क्षेत्र में एक नई बहस छेड़ दी है, जहां सुरक्षा और विनियमन को नए सिरे से परिभाषित करने की जरूरत है। आज हम इसी जटिल लेकिन बेहद महत्वपूर्ण विषय पर खुलकर बात करेंगे, ताकि आप भी जान सकें कि परमाणु ऊर्जा के सुरक्षित भविष्य के लिए दुनिया क्या कर रही है।

परमाणु सुरक्षा: क्यों यह हमारी सबसे बड़ी चिंता है?

सच कहूँ तो, जब मैं परमाणु ऊर्जा के बारे में सोचती हूँ, तो सबसे पहले मेरे मन में सुरक्षा का सवाल ही आता है। आखिर यह कोई साधारण ऊर्जा स्रोत तो है नहीं! इसकी शक्ति जितनी विशाल है, उतनी ही इसकी सुरक्षा चुनौतियाँ भी गंभीर हैं। चेरनोबिल और फुकुशिमा जैसी दुर्घटनाओं ने हमें सिखाया है कि एक छोटी सी चूक भी कितनी बड़ी तबाही ला सकती है। इसलिए, परमाणु ऊर्जा संयंत्रों की सुरक्षा को लेकर कोई समझौता नहीं किया जा सकता। दुनिया भर में कड़े सुरक्षा प्रोटोकॉल और मानकों का पालन किया जाता है ताकि किसी भी तरह के विकिरण रिसाव या दुर्घटना की संभावना को कम से कम किया जा सके। अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) इस दिशा में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। IAEA अपने सदस्य देशों को परमाणु सुरक्षा पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन (International Conference on Nuclear Security- ICONS) जैसे मंचों के माध्यम से नवीनतम सुरक्षा दिशानिर्देश और सर्वोत्तम अभ्यास प्रदान करती है। मेरे अनुभव से, जब हम किसी बड़ी और शक्तिशाली चीज़ का इस्तेमाल करते हैं, तो उसकी देखरेख और सुरक्षा उतनी ही ज़रूरी हो जाती है, और परमाणु ऊर्जा के मामले में तो यह और भी अधिक महत्वपूर्ण है। इस क्षेत्र में लगातार नए शोध और विकास हो रहे हैं, ताकि सुरक्षा प्रणालियों को और भी अभेद्य बनाया जा सके।

विकिरण सुरक्षा और आपातकालीन प्रतिक्रिया

परमाणु सुरक्षा का मतलब सिर्फ संयंत्रों को मजबूत बनाना नहीं है, बल्कि विकिरण से होने वाले खतरों से लोगों और पर्यावरण को बचाना भी है। IAEA, विकिरण सुरक्षा (radiation protection) पर सख्त मानक तय करता है, जिनका पालन सभी सदस्य देशों को करना होता है। इसके अलावा, किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए एक मजबूत आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रणाली का होना बेहद जरूरी है। फुकुशिमा दुर्घटना के बाद, IAEA ने वैश्विक परमाणु सुरक्षा को मजबूत करने के लिए एक कार्ययोजना को मंजूरी दी थी, जिसमें आपातकालीन तैयारियों और प्रतिक्रिया पर विशेष जोर दिया गया था। सोचिए, अगर हमारे पास पहले से कोई ठोस योजना न हो, तो छोटी सी समस्या भी कितनी बड़ी बन सकती है! मुझे लगता है कि यह ठीक वैसे ही है जैसे हम अपने घर में आग बुझाने वाले उपकरण रखते हैं, भले ही हमें उम्मीद न हो कि कभी उनका इस्तेमाल करना पड़े, लेकिन उनकी तैयारी हमें सुरक्षित महसूस कराती है।

मानवीय कारक और संगठनात्मक सुरक्षा संस्कृति

सिर्फ तकनीक ही सब कुछ नहीं होती, इंसान भी एक बहुत बड़ा कारक हैं। संयंत्रों को चलाने वाले लोगों की ट्रेनिंग, उनकी विशेषज्ञता और एक मजबूत सुरक्षा संस्कृति (safety culture) का होना बेहद महत्वपूर्ण है। अक्सर दुर्घटनाएं मानवीय त्रुटि या प्रक्रियाओं की अनदेखी के कारण होती हैं। इसलिए, IAEA मानव और संगठनात्मक कारकों (Human and organizational factors) पर भी ध्यान केंद्रित करता है। मुझे याद है, एक बार मेरे एक दोस्त ने बताया था कि कैसे एक छोटी सी गलती के कारण उनके काम में बड़ा नुकसान हो गया था। परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में ऐसी गलतियों की कोई गुंजाइश नहीं होती। इसलिए, कर्मचारियों को लगातार प्रशिक्षित करना, उन्हें सही प्रक्रियाएं सिखाना और एक ऐसी संस्कृति विकसित करना जहां सुरक्षा को हर कीमत पर प्राथमिकता दी जाए, बहुत जरूरी है।

अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की मजबूत दीवारें

आप और मैं जानते हैं कि दुनिया में कोई भी देश अकेला नहीं रह सकता, खासकर जब बात परमाणु ऊर्जा जैसे संवेदनशील विषय की हो। अंतर्राष्ट्रीय सहयोग इस क्षेत्र की रीढ़ की हड्डी है। जब देश एक साथ मिलकर काम करते हैं, तो वे न केवल सुरक्षा मानकों को मजबूत करते हैं बल्कि परमाणु प्रौद्योगिकी के शांतिपूर्ण उपयोग को भी बढ़ावा देते हैं। अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) इस सहयोग का केंद्र बिंदु है। यह एक स्वायत्त विश्व संस्था है जिसका गठन 29 जुलाई, 1957 को हुआ था और इसका मुख्यालय वियना, ऑस्ट्रिया में है। IAEA का मुख्य कार्य परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग को बढ़ावा देना और इसके सैन्य उपयोग को रोकना है। मैं तो हमेशा से मानती हूं कि एकजुटता में ही ताकत है, और परमाणु ऊर्जा के मामले में यह बात पूरी तरह से सही बैठती है। यह सिर्फ नियमों और संधियों का जाल नहीं है, बल्कि दुनिया भर के वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और नीति निर्माताओं का एक साझा प्रयास है, जो हमारे ग्रह को सुरक्षित रखने के लिए प्रतिबद्ध हैं। यह एक ऐसा मंच है जहाँ अनुभव, ज्ञान और संसाधन साझा किए जाते हैं ताकि हर देश अपने परमाणु कार्यक्रमों को उच्चतम सुरक्षा मानकों के साथ चला सके।

आईएईए की भूमिका और मानक

IAEA सिर्फ एक निगरानी संस्था नहीं है, बल्कि यह परमाणु सुरक्षा मानकों को स्थापित करने और उनके कार्यान्वयन को बढ़ावा देने वाला एक प्रमुख मंच भी है। यह विकिरण सुरक्षा, परमाणु प्रतिष्ठानों की सुरक्षा और रेडियोधर्मी सामग्री के सुरक्षित प्रबंधन के लिए दिशा-निर्देश जारी करता है। मुझे लगता है कि IAEA एक ऐसे भरोसेमंद दोस्त की तरह है जो आपको हर कदम पर सही सलाह और मदद देता है, ताकि आप कोई गलती न करें। इनके सुरक्षा मानक (Safety Standards) वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति के साथ लगातार अपडेट होते रहते हैं, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि दुनिया भर की परमाणु सुविधाएं हमेशा नवीनतम और सबसे प्रभावी सुरक्षा उपायों से लैस रहें।

संधियाँ और अंतर्राष्ट्रीय समझौते

अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को मजबूत करने के लिए कई महत्वपूर्ण संधियां और समझौते किए गए हैं। इनमें सबसे प्रमुख परमाणु अप्रसार संधि (NPT) है, जिसका उद्देश्य परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकना और शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा को बढ़ावा देना है। इसके अलावा, परमाणु सुरक्षा पर कन्वेंशन (Convention on Nuclear Safety) जैसे समझौते सदस्य देशों पर परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के सुरक्षित संचालन को लेकर कुछ खास जिम्मेदारियां डालते हैं। भारत ने भी अमेरिका, फ्रांस और रूस जैसे देशों के साथ द्विपक्षीय परमाणु समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं, जो सख्त सुरक्षा उपायों के तहत परमाणु ऊर्जा सहयोग पर केंद्रित हैं। ये संधियां सिर्फ कागजी कार्यवाही नहीं हैं, बल्कि यह एक अंतरराष्ट्रीय समुदाय की प्रतिबद्धता को दर्शाती हैं कि वे एक सुरक्षित और स्थिर परमाणु भविष्य चाहते हैं।

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अप्रसार का संकल्प: एक सुरक्षित भविष्य की कुंजी

परमाणु अप्रसार (Nuclear Non-Proliferation) का मुद्दा हमेशा से ही मेरे लिए बहुत मायने रखता है। यह सिर्फ हथियारों के फैलाव को रोकने की बात नहीं है, बल्कि यह एक सुरक्षित और शांतिपूर्ण दुनिया के निर्माण की दिशा में एक बड़ा कदम है। आप कल्पना कीजिए, अगर हर देश के पास परमाणु हथियार होते, तो हमारा ग्रह कितना खतरनाक होता! इसी खतरे को रोकने के लिए परमाणु अप्रसार संधि (NPT) जैसी महत्वपूर्ण संधियां अस्तित्व में आईं। यह संधि परमाणु हथियारों और उनकी तकनीक के प्रसार को रोकने, शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा को बढ़ावा देने और निरस्त्रीकरण को प्रोत्साहित करने के तीन स्तंभों पर आधारित है। 1970 में लागू हुई यह संधि आज भी वैश्विक परमाणु व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। मेरा मानना है कि यह एक ऐसा संकल्प है जो हमें एक बेहतर कल की ओर ले जाता है। भारत जैसे देशों ने, जो भले ही NPT पर हस्ताक्षरकर्ता न हों, हमेशा से परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग का समर्थन किया है और अप्रसार के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है। यह दिखाता है कि एक जिम्मेदार परमाणु शक्ति होने का क्या मतलब है।

परमाणु अप्रसार संधि (NPT) और उसकी चुनौतियाँ

NPT एक शक्तिशाली उपकरण है, लेकिन इसकी अपनी चुनौतियां भी हैं। यह संधि परमाणु हथियार संपन्न देशों (NWS) और गैर-परमाणु हथियार संपन्न देशों (NNWS) के बीच एक पदानुक्रम बनाती है, जिससे कुछ देशों में वैधता संबंधी चिंताएं बनी हुई हैं। भारत जैसे देशों ने इसे भेदभावपूर्ण मानते हुए इस पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं, हालांकि भारत ने परमाणु हथियारों को अवैध बनाने वाले प्रयासों का सक्रिय रूप से विरोध नहीं किया है। मुझे लगता है कि यह एक ऐसी स्थिति है जहां सभी पक्षों को मिलकर एक ऐसा रास्ता खोजना होगा जो सभी के लिए निष्पक्ष और सुरक्षित हो। हाल ही में, ईरान जैसे देशों द्वारा NPT से हटने की धमकी जैसी घटनाएं इस संधि के सामने आने वाली चुनौतियों को उजागर करती हैं। यह हमें याद दिलाता है कि नियमों का पालन कराना और विश्वास बनाए रखना कितना मुश्किल हो सकता है।

भारत की अप्रसार नीति और वैश्विक भूमिका

भारत ने हमेशा से एक जिम्मेदार परमाणु शक्ति होने का दावा किया है। हमने ‘पहले उपयोग नहीं’ (No First Use) की नीति अपनाई है और परमाणु हथियारों के पूर्ण निरस्त्रीकरण की वकालत की है। 1974 के अपने पहले परमाणु परीक्षण ‘स्माइलिंग बुद्धा’ के बाद भी भारत ने दुनिया को यह संकेत दिया कि ये परीक्षण विश्व शांति और भारत की सुरक्षा के लिए किए गए थे। हमने मिसाइल प्रौद्योगिकी नियंत्रण व्यवस्था (MTCR) और ऑस्ट्रेलिया समूह जैसे अंतरराष्ट्रीय अप्रसार व्यवस्थाओं में शामिल होकर अपनी प्रतिबद्धता भी दिखाई है। मेरे लिए, यह भारत की दूरदर्शिता और जिम्मेदारी की भावना को दर्शाता है। हम न केवल अपनी सुरक्षा सुनिश्चित कर रहे हैं बल्कि वैश्विक सुरक्षा में भी योगदान दे रहे हैं।

परमाणु कचरा: अगली पीढ़ी की चुनौती

अब बात करते हैं एक ऐसे मुद्दे की, जो परमाणु ऊर्जा के साथ हमेशा जुड़ा रहता है – परमाणु कचरा। सच कहूँ तो, यह एक ऐसी चुनौती है जिसे हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को सौंपते हैं, और इसलिए इसका प्रबंधन अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। मुझे याद है, जब मैंने पहली बार पढ़ा था कि परमाणु कचरा हजारों सालों तक रेडियोधर्मी बना रहता है, तो मुझे थोड़ी घबराहट हुई थी। लेकिन फिर मैंने जाना कि इसके सुरक्षित निपटान के लिए दुनिया भर में कड़े नियम और तकनीकें विकसित की जा रही हैं। परमाणु ऊर्जा संयंत्रों से उत्पन्न होने वाले रेडियोधर्मी अपशिष्ट का प्रबंधन ‘परमाणु ऊर्जा अधिनियम, 1962’ और ‘परमाणु ऊर्जा (रेडियोधर्मी अपशिष्टों का सुरक्षित निपटान) नियम, 1987’ के प्रावधानों के तहत सुरक्षित रूप से किया जाता है। IAEA भी रेडियोधर्मी अपशिष्ट प्रबंधन पर अंतर्राष्ट्रीय दिशानिर्देश प्रदान करता है। यह एक ऐसी चुनौती है जिसके लिए वैज्ञानिक नवाचार और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग दोनों की आवश्यकता है।

अपशिष्ट के प्रकार और प्रबंधन रणनीतियाँ

परमाणु कचरा कई प्रकार का होता है, जैसे निम्न-स्तरीय, मध्यम-स्तरीय और उच्च-स्तरीय अपशिष्ट। प्रत्येक प्रकार के अपशिष्ट के प्रबंधन के लिए अलग-अलग रणनीतियाँ अपनाई जाती हैं। निम्न और मध्यम गतिविधि स्तर के अपशिष्टों को अक्सर संयंत्र स्थल पर ही उपचारित, सांद्रित और सीमेंट जैसी ठोस सामग्रियों में स्थिर करके विशेष रूप से निर्मित संरचनाओं, जैसे प्रबलित कंक्रीट खाइयों और टाइल के छिद्रों के माध्यम से निपटारा किया जाता है। उच्च-स्तरीय अपशिष्ट, जो सबसे खतरनाक होता है, को आमतौर पर पिघले हुए ग्लास में मिलाकर (vitrification) और फिर गहरे भूगर्भीय भंडारों (deep geological repositories) में सुरक्षित रूप से दफन किया जाता है। यह एक जटिल प्रक्रिया है और मुझे लगता है कि इसे समझना बहुत ज़रूरी है ताकि हम इस चुनौती की गंभीरता को जान सकें।

दीर्घकालिक भंडारण और पर्यावरणीय चिंताएँ

परमाणु कचरे का दीर्घकालिक भंडारण एक बड़ी इंजीनियरिंग और सामाजिक चुनौती है। हमें ऐसे सुरक्षित स्थान चाहिए जो हजारों सालों तक इस कचरे को पर्यावरण से दूर रख सकें। मुझे लगता है कि यह ठीक वैसे ही है जैसे हम अपने बच्चों के लिए सुरक्षित भविष्य की योजना बनाते हैं – हमें बहुत दूर तक सोचना होता है। पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (Environmental Impact Assessment – EIA) परमाणु परियोजनाओं का एक अनिवार्य हिस्सा हैं, जो रेडियोधर्मी अपशिष्ट के निर्वहन सहित संभावित पर्यावरणीय और स्वास्थ्य प्रभावों का मूल्यांकन करते हैं। भारत में भी परमाणु अपशिष्ट के प्रबंधन के लिए प्रणालियाँ स्थापित हैं, जिनमें साइट पर भंडारण के बाद दीर्घकालिक भंडारण भी शामिल है। हालांकि, केंद्रीकृत अपशिष्ट भंडारों की कमी अभी भी चिंता का विषय है। यह एक ऐसा क्षेत्र है जहां लगातार शोध और नवाचार की जरूरत है ताकि हम अपनी धरती को सुरक्षित रख सकें।

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छोटी तकनीकों का बड़ा वादा: SMRs और उनका विनियमन

दोस्तों, मैं आपसे सच कहूं तो जब मैंने पहली बार छोटे मॉड्यूलर रिएक्टरों (SMRs) के बारे में सुना, तो मुझे लगा कि यह परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में एक गेम-चेंजर साबित हो सकता है! पारंपरिक बड़े रिएक्टरों की तुलना में SMRs छोटे, सुरक्षित और अधिक लचीले होते हैं। इनकी क्षमता आमतौर पर 300 मेगावाट (MW) तक होती है, जो पारंपरिक रिएक्टरों से काफी कम है। मुझे लगता है कि यह ठीक वैसे ही है जैसे पहले बड़े-बड़े कंप्यूटर होते थे और अब हमारे पास स्मार्टफोन्स हैं – छोटे, अधिक कुशल और हर जगह इस्तेमाल किए जा सकने वाले। SMRs को फैक्ट्रियों में प्री-फैब्रिकेट किया जा सकता है और फिर स्थापना स्थल पर लाकर जोड़ा जा सकता है, जिससे निर्माण का समय और लागत दोनों कम हो जाते हैं। यह एक ऐसी तकनीक है जो ऊर्जा सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन से लड़ने में एक नई उम्मीद जगा रही है। भारत भी इस क्षेत्र में काफी दिलचस्पी ले रहा है और 2047 तक अपने परमाणु ऊर्जा लक्ष्यों को प्राप्त करने में SMRs को एक महत्वपूर्ण उपकरण मानता है।

SMRs के लाभ और सुरक्षा सुविधाएँ

SMRs के कई फायदे हैं। सबसे पहले, इनमें उन्नत निष्क्रिय सुरक्षा प्रणालियाँ (passive safety systems) होती हैं, जो बिना बाहरी ऊर्जा स्रोत के भी रिएक्टर को ठंडा कर सकती हैं, जिससे दुर्घटनाओं की संभावना बहुत कम हो जाती है। यह मेरे लिए बहुत आश्वस्त करने वाली बात है! इसके अलावा, ये कम कार्बन बिजली (low-carbon electricity) का उत्पादन करते हैं, जो जलवायु लक्ष्यों को पूरा करने में सहायक है। इनकी मॉड्यूलर प्रकृति इन्हें दूरदराज के क्षेत्रों या छोटी बिजली ग्रिड्स के लिए उपयुक्त बनाती है, जहां बड़े संयंत्र व्यवहार्य नहीं होते। सोचिए, ये छोटे रिएक्टर कोयला आधारित थर्मल पावर स्टेशनों को बंद करने और स्वच्छ ऊर्जा में बदलने में भी मदद कर सकते हैं। यह वाकई कमाल की बात है!

विनियामक चुनौतियाँ और सार्वजनिक स्वीकृति

हालांकि SMRs का वादा बहुत बड़ा है, लेकिन इनकी अपनी चुनौतियाँ भी हैं। सबसे बड़ी चुनौती नियामक स्वीकृति (regulatory approval) की है। मौजूदा परमाणु नियामक ढांचे मुख्य रूप से बड़े रिएक्टरों के लिए डिज़ाइन किए गए हैं, और SMR-विशिष्ट विशेषताओं को समायोजित करने के लिए उन्हें अपडेट करने की आवश्यकता है। मुझे लगता है कि यह ठीक वैसे ही है जैसे किसी नई तकनीक के लिए नए नियम बनाने पड़ते हैं। इसके अलावा, परमाणु आपदाओं के भय के कारण सार्वजनिक स्वीकृति (public acceptance) भी एक बड़ी बाधा बनी हुई है। लोगों को चेरनोबिल जैसी घटनाओं की यादें परेशान करती हैं, इसलिए प्रभावी जागरूकता और सहभागिता की आवश्यकता है ताकि इन चिंताओं को दूर किया जा सके। भारत को SMR प्रोटोटाइप का निर्माण करके डिजाइन और परिचालन विश्वसनीयता को प्रमाणित करना चाहिए ताकि जनता का विश्वास जीता जा सके।

भारत का परमाणु सपना और वैश्विक मानक

जब मैं भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के बारे में सोचती हूँ, तो मुझे एक मजबूत और आत्मनिर्भर देश की तस्वीर नजर आती है। भारत ने हमेशा से ही परमाणु ऊर्जा को अपनी ऊर्जा सुरक्षा और विकास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना है। आप जानते हैं, हमारा लक्ष्य 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु ऊर्जा उत्पादन का है! यह कोई छोटा लक्ष्य नहीं है, और इसे हासिल करने के लिए हम लगातार काम कर रहे हैं। मुझे याद है, बचपन में हम विज्ञान की किताबों में परमाणु ऊर्जा के बारे में पढ़ते थे और सोचते थे कि यह कितनी बड़ी शक्ति है। आज, भारत अपनी स्वदेशी परमाणु प्रौद्योगिकी में भारी निवेश कर रहा है, जिससे विदेशी आपूर्तिकर्त्ताओं पर हमारी निर्भरता कम हो और ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित हो। यह सिर्फ बिजली पैदा करने की बात नहीं है, बल्कि यह आत्मनिर्भर भारत के सपने को साकार करने की बात है।

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भारत की स्वदेशी प्रौद्योगिकी और महत्वाकांक्षी लक्ष्य

भारत का परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम होमी जे. भाभा के मार्गदर्शन में 1940 के दशक के उत्तरार्द्ध में शुरू हुआ था। हमने प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) और छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर (SMR) जैसी उन्नत तकनीकों में प्रगति की है। प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR), जो 2024 में कोर लोडिंग तक पहुँच जाएगा, थोरियम आधारित परमाणु ऊर्जा विकसित करने की दिशा में भारत की प्रगति का एक बड़ा उदाहरण है। मुझे लगता है कि यह एक ऐसे खिलाड़ी की तरह है जो अपने दम पर खेल को जीतने की कोशिश कर रहा है। सरकार सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) को भी बढ़ावा दे रही है ताकि परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में पूंजी और नवाचार को बढ़ावा मिल सके। यह एक ऐसी पहल है जो इस क्षेत्र में तेजी से विकास लाएगी।

अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और नियामक ढाँचा

अपनी स्वदेशी क्षमताओं के बावजूद, भारत वैश्विक परमाणु समुदाय के साथ सक्रिय रूप से जुड़ता है। हमने अमेरिका, रूस और फ्रांस जैसे देशों के साथ असैन्य परमाणु समझौते किए हैं, जिससे हमें यूरेनियम की आपूर्ति और उन्नत परमाणु प्रौद्योगिकियों पर सहयोग मिल रहा है। मुझे लगता है कि यह ठीक वैसे ही है जैसे हम अपने दोस्तों से सीखते हैं और उन्हें सिखाते भी हैं। भारत में परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE) और परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड (AERB) सुरक्षा मानकों को निर्धारित करने और नियमों को लागू करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। भारतीय परमाणु सुविधाओं पर विकिरण का स्तर लगातार वैश्विक मानकों से काफी नीचे रहा है, जो सुरक्षित और सतत परमाणु ऊर्जा के प्रति देश की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। यह हमें यह भरोसा दिलाता है कि भारत अपनी परमाणु शक्ति का उपयोग जिम्मेदारी से कर रहा है।

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जलवायु परिवर्तन से लड़ाई में परमाणु ऊर्जा की भूमिका

दोस्तों, आजकल हर तरफ जलवायु परिवर्तन (Climate Change) की बात हो रही है, और यह होनी भी चाहिए! यह हमारे ग्रह के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती है। ऐसे में, जब हम स्वच्छ ऊर्जा विकल्पों की तलाश कर रहे हैं, तो परमाणु ऊर्जा एक महत्वपूर्ण समाधान के रूप में उभरती है। मुझे पता है कि कुछ लोगों को इस पर संदेह होता है, लेकिन सच कहूं तो, परमाणु ऊर्जा बिजली उत्पादन के दौरान ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन नहीं करती। यह उन चुनिंदा ऊर्जा स्रोतों में से एक है जो बड़े पैमाने पर और लगातार बिजली पैदा कर सकता है, बिना वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड छोड़े। मेरा मानना है कि जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए हमें हर हथियार का इस्तेमाल करना होगा, और परमाणु ऊर्जा उनमें से एक शक्तिशाली हथियार है। यह हमें पेरिस जलवायु समझौते (Paris Climate Agreement) जैसे वैश्विक लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद कर सकती है, जहां लगभग 200 देशों ने ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन खत्म करने का वादा किया है।

पहलू परमाणु ऊर्जा नवीकरणीय ऊर्जा (सौर/पवन)
कार्बन उत्सर्जन (बिजली उत्पादन) लगभग शून्य लगभग शून्य
विश्वसनीयता/निरंतरता उच्च (24/7 संचालन संभव) मौसम और धूप पर निर्भर
भूमि की आवश्यकता अपेक्षाकृत कम अपेक्षाकृत अधिक (विशेषकर सौर के लिए)
प्रारंभिक लागत उच्च मध्यम से उच्च (गिरती हुई)
अपशिष्ट प्रबंधन रेडियोधर्मी अपशिष्ट (दीर्घकालिक चुनौती) कम (पुनर्चक्रण योग्य सामग्री)

कार्बन उत्सर्जन में कमी का योगदान

पिछले 50 वर्षों में परमाणु ऊर्जा ने लगभग 74 गीगाटन CO2 उत्सर्जन को बचाया है, जो एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। यह हमें यह समझने में मदद करता है कि जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने में परमाणु ऊर्जा कितनी प्रभावी हो सकती है। मेरे अनुभव से, जब हम कोई बड़ा लक्ष्य हासिल करना चाहते हैं, तो हमें कई अलग-अलग तरीकों से सोचना होता है। परमाणु ऊर्जा हमें एक स्थिर और विश्वसनीय ऊर्जा स्रोत प्रदान करती है, खासकर जब सौर और पवन ऊर्जा जैसे नवीकरणीय स्रोत उपलब्ध न हों। यह हमें ऊर्जा ग्रिड को स्थिर रखने में मदद करती है, जो आधुनिक समाज के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

चुनौतियाँ और नवीकरणीय ऊर्जा के साथ समन्वय

हालांकि परमाणु ऊर्जा के अपने फायदे हैं, लेकिन यह पूरी तरह से कार्बन-मुक्त नहीं है, क्योंकि यूरेनियम के खनन और परिष्करण के दौरान कुछ ग्रीनहाउस गैसें उत्पन्न होती हैं। इसके अलावा, परमाणु कचरा प्रबंधन और दुर्घटनाओं की संभावना जैसी चिंताएं भी बनी हुई हैं। मुझे लगता है कि इन चुनौतियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसलिए, जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए हमें परमाणु ऊर्जा और नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों (जैसे सौर और पवन) के बीच समन्वय स्थापित करना होगा। दोनों के अपने फायदे और नुकसान हैं, और सबसे अच्छा तरीका यह है कि हम उनका एक साथ उपयोग करें ताकि एक टिकाऊ और स्वच्छ ऊर्जा भविष्य का निर्माण हो सके।

भविष्य की ओर: परमाणु ऊर्जा का अगला अध्याय

दोस्तों, जैसे-जैसे हम भविष्य की ओर बढ़ते हैं, परमाणु ऊर्जा का परिदृश्य लगातार बदल रहा है। मुझे ऐसा लगता है कि हम एक ऐसे मोड़ पर खड़े हैं जहाँ पुराने तरीकों को नए नवाचारों के साथ जोड़ा जा रहा है, ताकि एक सुरक्षित और अधिक टिकाऊ ऊर्जा भविष्य बनाया जा सके। IAEA की 2024 की रिपोर्ट में जलवायु परिवर्तन और परमाणु ऊर्जा पर जोर दिया गया है, जिसमें परमाणु ऊर्जा के विस्तार के लिए आवश्यक निवेश में उल्लेखनीय वृद्धि की आवश्यकता पर बल दिया गया है। यह दर्शाता है कि दुनिया इस ऊर्जा स्रोत की क्षमता को पहचान रही है। मेरा मानना है कि यह सिर्फ प्रौद्योगिकी का विकास नहीं है, बल्कि यह मानव जाति की दृढ़ता और चुनौतियों से सीखने की क्षमता का भी प्रमाण है। हम चेरनोबिल और फुकुशिमा से सबक सीखकर आगे बढ़ रहे हैं, और नए रिएक्टर डिजाइनों के साथ सुरक्षा को और मजबूत कर रहे हैं।

उन्नत रिएक्टर प्रौद्योगिकियाँ और नवाचार

स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर (SMRs) परमाणु ऊर्जा के भविष्य के लिए एक बहुत बड़ा वादा हैं। इनकी मॉड्यूलर डिजाइन, बढ़ी हुई सुरक्षा सुविधाएँ और छोटे आकार इन्हें विभिन्न अनुप्रयोगों के लिए आदर्श बनाते हैं। भारत भी इन उन्नत रिएक्टरों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है, जिसमें फ्रांस जैसे देशों के साथ सहयोग शामिल है। मुझे लगता है कि यह ठीक वैसे ही है जैसे हम अपने सपनों को साकार करने के लिए नई तकनीकों का इस्तेमाल करते हैं। उच्च तापमान वाले गैस-कूल्ड रिएक्टर और पिघले हुए नमक रिएक्टर जैसे अन्य उन्नत रिएक्टर डिजाइन भी विकसित किए जा रहे हैं, जो भारत के प्रचुर थोरियम संसाधनों का उपयोग कर सकते हैं। ये नवाचार न केवल दक्षता में सुधार करेंगे बल्कि परमाणु अपशिष्ट के बोझ को भी कम करेंगे।

अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और सामंजस्यपूर्ण नीतियाँ

भविष्य में, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और सामंजस्यपूर्ण नीतियां पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण होंगी। परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग को बढ़ावा देने और अप्रसार को सुनिश्चित करने के लिए सभी देशों को मिलकर काम करना होगा। IAEA, संयुक्त राष्ट्र महासभा और सुरक्षा परिषद को अपनी गतिविधियों की रिपोर्ट करता है, जो वैश्विक मंच पर परमाणु मुद्दों को संबोधित करने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका को दर्शाता है। मुझे लगता है कि यह ठीक वैसे ही है जैसे एक बड़े परिवार में हर सदस्य का सहयोग जरूरी होता है। परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में अनुसंधान और विकास को बढ़ावा देना, कौशल अंतराल को भरना और सार्वजनिक स्वीकृति सुनिश्चित करना भी भविष्य की सफलता के लिए महत्वपूर्ण होगा। विकसित भारत के लिए परमाणु ऊर्जा मिशन जैसी पहलें 2047 तक भारत को उन्नत परमाणु प्रौद्योगिकी में वैश्विक लीडर के रूप में स्थापित करने के लिए तैयार हैं। यह एक रोमांचक यात्रा है और मैं उम्मीद करती हूँ कि हम सब मिलकर एक सुरक्षित और ऊर्जा-कुशल भविष्य का निर्माण कर पाएंगे।

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글을마चते हुए

दोस्तों, आज हमने परमाणु ऊर्जा के एक बेहद महत्वपूर्ण पहलू, यानी इसकी सुरक्षा और भविष्य पर गहराई से बात की। मुझे पूरी उम्मीद है कि अब आपके मन में इस असीमित ऊर्जा स्रोत के प्रति एक नई समझ और विश्वास पैदा हुआ होगा। यह सिर्फ एक ऊर्जा विकल्प नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन से लड़ने और एक स्थायी भविष्य बनाने की दिशा में एक शक्तिशाली कदम है। अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और निरंतर नवाचार ही हमें इस पथ पर सुरक्षित रूप से आगे ले जाएगा। तो आइए, इस ऊर्जा के सुरक्षित और जिम्मेदार उपयोग की दिशा में हम सब मिलकर जागरूक रहें।

जानने योग्य उपयोगी जानकारी

1. IAEA (अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी) परमाणु सुरक्षा मानकों को स्थापित करने और उनके कार्यान्वयन को बढ़ावा देने वाली प्रमुख वैश्विक संस्था है, जो दुनिया भर में सुरक्षा सुनिश्चित करती है।

2. SMRs (छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर) परमाणु ऊर्जा के भविष्य के लिए एक गेम-चेंजर हो सकते हैं। ये छोटे, सुरक्षित और अधिक लचीले रिएक्टर ऊर्जा उत्पादन में क्रांति ला सकते हैं।

3. परमाणु कचरे का सुरक्षित प्रबंधन एक बड़ी चुनौती है, जिसके लिए गहरे भूगर्भीय भंडार (deep geological repositories) जैसी उन्नत तकनीकों का उपयोग किया जा रहा है ताकि पर्यावरण को सुरक्षित रखा जा सके।

4. भारत की ‘नो फर्स्ट यूज’ (पहले उपयोग नहीं) की नीति और परमाणु अप्रसार के प्रति उसकी मजबूत प्रतिबद्धता उसे एक जिम्मेदार परमाणु शक्ति के रूप में स्थापित करती है।

5. परमाणु ऊर्जा बिजली उत्पादन के दौरान ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन नहीं करती, जिससे यह जलवायु परिवर्तन से लड़ने और कार्बन उत्सर्जन को कम करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

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महत्वपूर्ण बातों का सारांश

संक्षेप में कहें तो, परमाणु ऊर्जा का भविष्य उसकी सुरक्षा, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग, अप्रसार और नवीन तकनीकों पर निर्भर करता है। IAEA जैसे संगठन वैश्विक मानकों को सुनिश्चित करते हैं, जबकि SMRs जैसी तकनीकें इस क्षेत्र में क्रांति ला रही हैं। परमाणु कचरा प्रबंधन और सार्वजनिक स्वीकृति अभी भी चुनौतियां हैं, लेकिन भारत जैसे देश इन पर सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं और अपनी क्षमता का विकास कर रहे हैं। याद रखें, एक सुरक्षित और स्वच्छ ऊर्जा भविष्य के लिए परमाणु ऊर्जा एक महत्वपूर्ण घटक है, जिसे जिम्मेदारी से उपयोग किया जाना चाहिए।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ) 📖

प्र: अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा नीतियों और सुरक्षा को सुनिश्चित करने वाली मुख्य वैश्विक संस्थाएं और संधियाँ कौन-कौन सी हैं?

उ: मेरे प्यारे दोस्तों, जब हम अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा की बात करते हैं, तो मन में पहला नाम आता है अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) का। यह संयुक्त राष्ट्र परिवार का एक अभिन्न अंग है, जो दुनिया भर में परमाणु ऊर्जा के सुरक्षित, संरक्षित और शांतिपूर्ण उपयोग को बढ़ावा देने का काम करता है। अगर मैं अपनी समझ से बताऊं, तो यह संस्था एक तरह से ग्लोबल वॉचडॉग है, जो यह सुनिश्चित करती है कि देश परमाणु प्रौद्योगिकी का उपयोग सिर्फ बिजली बनाने या मेडिकल उद्देश्यों के लिए करें, न कि हथियार बनाने के लिए।
इसके अलावा, परमाणु अप्रसार संधि (NPT) एक और बेहद महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय संधि है। यह संधि परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकने, परमाणु निरस्त्रीकरण को बढ़ावा देने और परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग के अधिकार को सुनिश्चित करने के तीन स्तंभों पर आधारित है। मेरी राय में, यह संधि परमाणु क्लब के सदस्यों और गैर-सदस्यों के बीच एक सेतु का काम करती है, जहाँ सदस्य देशों को निरस्त्रीकरण की दिशा में काम करना होता है, और गैर-सदस्य देशों को परमाणु हथियार विकसित न करने की शपथ लेनी होती है। हाल ही में, IAEA ने परमाणु सामग्री की तस्करी पर चिंता जताई है, जो यह दर्शाता है कि इन संस्थाओं और संधियों की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है। वे सिर्फ नियम नहीं बनाते, बल्कि यह भी सुनिश्चित करते हैं कि उन नियमों का पालन हो।

प्र: छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर (SMRs) जैसी नई प्रौद्योगिकियां परमाणु सुरक्षा और नीति को कैसे प्रभावित कर रही हैं, और वे क्या अवसर और चुनौतियाँ पेश करती हैं?

उ: वाह, यह एक ऐसा सवाल है जो मुझे भी बहुत रोमांचित करता है! छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर (SMRs) आजकल परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में सबसे हॉट टॉपिक बने हुए हैं। आपने देखा होगा, जब कोई नई तकनीक आती है तो वह कितनी उम्मीदें लेकर आती है, SMRs भी कुछ वैसे ही हैं। परंपरागत बड़े परमाणु रिएक्टरों के मुकाबले ये काफी छोटे होते हैं और इन्हें फैक्ट्रियों में बनाकर साइट पर असेंबल किया जा सकता है।
मेरे अनुभव में, SMRs कई मायनों में गेम-चेंजर साबित हो सकते हैं। सबसे पहले, उनकी सुरक्षा सुविधाएँ बेहतर मानी जाती हैं क्योंकि उनका डिज़ाइन सरल होता है और वे निष्क्रिय सुरक्षा प्रणालियों का उपयोग करते हैं, जिसका मतलब है कि आपात स्थिति में उन्हें सक्रिय हस्तक्षेप की आवश्यकता कम होती है। यह फुकुशिमा जैसी दुर्घटनाओं से मिली सीख का ही परिणाम है। नीतिगत रूप से, ये छोटे आकार के कारण दूरदराज के इलाकों या छोटे बिजली ग्रिडों के लिए अधिक सुलभ हो सकते हैं, जिससे ऊर्जा पहुँच में सुधार होता है। भारत जैसे देश जो 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु ऊर्जा उत्पादन का लक्ष्य लेकर चल रहे हैं, उनके लिए SMRs निजी क्षेत्र की भागीदारी के साथ एक बड़ा अवसर हो सकते हैं।
हालांकि, चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं। SMRs अभी भी अपनी प्रारंभिक अवस्था में हैं, और उनकी लाइसेंसिंग और नियामक ढाँचा अभी भी विकसित हो रहा है। हमें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि इन छोटे रिएक्टर्स में भी वही सख्त सुरक्षा मानक लागू हों जो बड़े रिएक्टर्स पर होते हैं। इसके अलावा, यूरेनियम संवर्धन और खर्च किए गए ईंधन के निपटान का मुद्दा अभी भी बना रहेगा। लेकिन मुझे पूरा यकीन है कि सही नीतियों और कठोर निगरानी के साथ, SMRs हमारे स्वच्छ ऊर्जा भविष्य का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकते हैं।

प्र: वैश्विक स्तर पर परमाणु सुरक्षा सुनिश्चित करने में सबसे बड़ी चुनौतियाँ क्या हैं, खासकर परमाणु सामग्री की तस्करी के संबंध में, और इनसे कैसे निपटा जा रहा है?

उ: दोस्तों, यह सवाल जितना सीधा लगता है, उतना ही गहरा भी है। परमाणु सुरक्षा सुनिश्चित करना एक ऐसा काम है जिसमें पलक झपकना भी भारी पड़ सकता है। मेरी अपनी समझ कहती है कि सबसे बड़ी चुनौती परमाणु सामग्री की तस्करी और परमाणु आतंकवाद का खतरा है। सोचिए, अगर परमाणु सामग्री गलत हाथों में पड़ जाए, तो क्या हो सकता है?
यह कल्पना भी दिल दहला देती है। हाल ही में, IAEA ने भी इस पर गहरी चिंता जताई है।
इस चुनौती से निपटने के लिए कई कदम उठाए जा रहे हैं। सबसे पहले, अंतरराष्ट्रीय सहयोग बहुत ज़रूरी है। देश एक-दूसरे के साथ खुफिया जानकारी साझा कर रहे हैं और सीमा नियंत्रण को मजबूत कर रहे हैं ताकि परमाणु सामग्री की आवाजाही को रोका जा सके। फिर, IAEA सदस्य देशों को परमाणु सामग्री के भौतिक संरक्षण के लिए मार्गदर्शन और प्रशिक्षण प्रदान करता है। मुझे याद है, एक बार मैंने पढ़ा था कि कैसे कुछ देश अपनी परमाणु सुविधाओं की सुरक्षा को मजबूत करने के लिए नवीनतम तकनीकों का उपयोग कर रहे हैं, जैसे उन्नत निगरानी प्रणाली और बायोमेट्रिक एक्सेस कंट्रोल।
इसके अलावा, परमाणु सुरक्षा सम्मेलन और शिखर सम्मेलन नियमित रूप से आयोजित किए जाते हैं जहाँ राष्ट्राध्यक्ष और विशेषज्ञ परमाणु सुरक्षा को मजबूत करने के तरीकों पर चर्चा करते हैं। ये बैठकें सिर्फ भाषण देने के लिए नहीं होतीं, बल्कि ठोस योजनाएँ बनाने और प्रतिबद्धताएँ व्यक्त करने के लिए होती हैं। मुझे लगता है कि यह एक सतत लड़ाई है, जहाँ हमें हर पल सतर्क रहना होगा। यह सिर्फ सरकारों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है कि हम इस असीम शक्ति को सुरक्षित रखें।

📚 संदर्भ